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उनके गुरु महाप्रभु वल्लभाचार्य थे, जिनसे उनकी भेंट मथुरा के गऊघाट पर हुई थी। उनके प्रभाव में आकर सूरदास जी कृष्ण-लीला का गान करने लगे。

उनकी मृत्यु सन् 1583 ई. (संवत् 1640 वि.) में गोवर्धन के पास पारसौली नामक गाँव में हुई।

हिंदी साहित्य के के महान कवि सूरदास जी का जीवन परिचय नीचे संक्षेप में दिया गया है: जीवन परिचय (Biography)

वे वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित 'अष्टछाप' के कवियों में प्रमुख (अग्रणी) माने जाते हैं。

वे जन्म से अंधे थे या बाद में हुए, इस पर भी अलग-अलग राय है। उनकी रचनाओं में कृष्ण की बाल-लीलाओं का सूक्ष्म वर्णन देखकर कई विद्वान मानते हैं कि वे जन्म से अंधे नहीं रहे होंगे।

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